Wednesday, June 17, 2015

भारतीय विदेश सेवा के अफसर इलाहाबाद के रहने वाले विकास स्वरूप 20 जनवरी 2015 को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक समारोह में आए थे। तब मैंने उनसे बात कर उनके तीसरे उपन्यास पर बन रही फिल्म से बारे में जानकारी ली थी। अब इस फिल्म के कलाकार फाइनल हो चुके हैं दीपिका पादुकोण और अनिल कपूर इसमें अभिनय करने जा रहे हैं। बड़ी रोचक है यह कहानी आप अगर पढ़ना चाहें। विकास स्वरूप के तीसरे उपन्यास पर भी बन रही फिल्म ----------शहर की शान--------- -पहले उपन्यास पर बनी फिल्म स्लम डॉग मिलेनियर ने जीते थे ऑस्कर के सात पुरस्कार -दिल्ली मेंइलेक्ट्रानिक्स की दुकान पर काम करने वाली सेल्स गर्ल पर आधारित है इसकी कहानी इलाहाबाद प्रमुख संवाददाता जाने-माने लेखक एवं भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के अफसर विकास स्वरूप के तीसरे उपन्यास दी एक्सीडेन्टल आप्रेन्टिस पर भी बहुत जल्द फिल्म बन जाएगी। एक हसीना थी, जॉनी गद्दार और एजेन्ट विनोद जैसी थ्रिलर फिल्मों का निर्देशन कर चुके श्रीराम राघवन उनके इस उपन्यास पर फिल्म बना रहे हैं। श्री स्वरूप के उपन्यास क्यू एण्ड ए पर बनी फिल्म स्लम डॉग मिलेनियर ने ऑस्कर के सात श्रेणी के पुरस्कार जीते थे। भारत में 15 करोड़ से अधिक का व्यवसाय करने वाली इस फिल्म की कहानी मुम्बई के जुहू की मलिन बस्ती में रहने वाले एक युवा जमाल मलिक पर आधारित थी। जो एक क्विज शो में शामिल होकर अपनी याददास्त के आधार पर प्रश्नों का उत्तर देता है। इविवि में आयोजित कार्यक्रम में श्री स्वरूप ने अपने तीनों उपान्यास क्यू एण्ड ए, सिक्स सस्पेक्ट्स और दी एक्सीडेन्टल आप्रेन्टिस की कहानी के बारे में चर्चा की। वरिष्ठ अधिवक्ता विनोद स्वरूप के बेटे श्री स्वरूप ने बताया कि सिक्स सस्पेन्स हत्या में शामिल यूपी के गृह मंत्री के एक बेटे की कहानी है जबकि दी एक्सीडेन्टल आप्रेन्टिस की कहानी दिल्ली की एक इलेक्ट्रानिक दुकान पर काम करने वाली सेल्स गर्ल की है। सामान्य सी इस सेल्स गर्ल को एक कंपनी इस शर्त के साथ अपना सीईओ बनाने के लिए ऑफर करती है कि उसे सात टेस्ट पास करने होंगे। इस टेस्ट में उसके चरित्र, हिम्मत और काबिलियत की परीक्षा ली जाती है। तन्हाई ने बना दिया लेखक श्री स्वरूप ने कहा कि उन्होंने अपना पहला उपन्यास क्यू एण्ड ए लंदन में रहते हुए तब लिखा था जब उनकी पत्नी अर्पणा और बच्चे आदित्य और वरूण उनके साथ नहीं थे। मजाकिया लहजे में उन्होंने कहा कि उपन्यास लिख उन्होंने इस बात को झूठला दिया था कि हर सफल व्यक्ति के पीछे एक महिला का हाथ होता है। दामाद सरीखी होती है ऐसी फिल्म... श्री स्वरूप ने कहा कि स्लम डॉग मिलेनियर रीलिज होने के बाद ऐसी खबर आई थी कि वह इस फिल्म से संतुष्ट नहीं हैं लेकिन ऐसा नहीं था क्योंकि उपन्यास छपने से पहले ही फिल्म के लिए यह कहानी ले ली गई थी और उस वक्त उन्हें बता दिया गया था कि पूरे उपान्यास नहीं बल्कि इसकी आत्मा पर फिल्म बनेगी। उन्होंने कहा कि उस वक्त उनसे जब सवाल पूछे गए तो उन्हें जाने-माने फिल्म निर्माता की बात याद आई थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि उपन्याय लेखक की बेटी होती है और उस उपन्यास पर बनी फिल्म उसका दामाद और दामाद की बुराई सार्वजनिक तौर पर नहीं की जाती है।

Saturday, June 13, 2015

नाम से ग्रुप बना कोई कर तो नहीं रहा बदनाम

-सोशल नेटवर्किंग वाट्सएप की सुविधाओं का कुछ लोग कर रहे हैं बेजा इस्तेमाल -खुंदक निकालने के लिए भी बनाया जा रहा है वाट्सएप ग्रुप, हो रहे आपत्तिजनक पोस्ट इलाहाबाद, आनंद मिश्र वाकया एक: दारागंज के कमलेश यादव का स्मार्ट फोन लेकर उनके 15 साल के भतीजे ने उन्हीं के नाम से वाट्सएप ग्रुप बनाया और मोबाइल में जितने भी नंबर थे सभी को ग्रुप से जोड़ दिया। थोड़ी देर बाद कमलेश के एक दोस्त ने उन्हें फोनकर ग्रुप बनाने के बारे में पूछा तो कमलेश को जानकारी हुई। कमलेश ग्रुप लेफ्ट कर गए। अल्फाबेटिकली लिस्ट में जिनका नाम सबसे ऊपर था वह ग्रुप का एडमिन हो गया। लेकिन कमलेश की सिरदर्दी कम नहीं हुई। ग्रुप में जुड़े ज्यादातर लोग उनके परिचित थे। लिहाजा ग्रुप में कोई भी आपत्तिजनक मैसेज, वीडियो या फोटो पड़ने पर लोग कमलेश को फोनकर शिकायत करने लगे। वाकया दो: एक संस्था के पदाधिकारी ने बुधवार को अपनी ही संस्था के खिलाफ एक वाट्सएप ग्रुप बनाकर संस्था के कई सदस्यों को जोड़ दिया। थोड़ी देर बाद ग्रुप बनाने वाला पदाधिकारी लेफ्ट कर गया और जिनका नाम सबसे ऊपर था वे ग्रुप एडमिन हो गए। बाकी लोगों ने ग्रुप एडमिन को फोनकर पूछना शुरू कर दिया। उन्होंने नेट ऑन किया और एक संदेश लिख ग्रुप लेफ्ट कर गए। वाकया तीन: यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों ने फेमली ऑफ पुर्नजीवन के नाम से वाट्सएप ग्रुप बनाया है। एक दिन ग्रुप से जुड़े एक व्यक्ति ने आपत्तिजनक फोटो पोस्ट कर दी। ग्रुप में कई लड़कियां भी शामिल थीं। लोग ग्रुप बनाने वाले आलोक त्रिपाठी को कोसने लगे। आलोक ने ग्रुप पर अफसोस जताया। सफाई दी तो मामला शांत हुआ। इन तीनों प्रकरण से स्पष्ट है कि सोशल नेटवर्किंग वाट्सएप का बेजा इस्तेमाल भी शुरू हो गया है। कई लोग इस चक्कर में बिना कुछ किए ही बदनाम हो रहे हैं। कमलेश यादव को ही लीजिए, वह अपने दोस्तों को लगातार सफाई दे रहे हैं। ग्रुप पर आए आपत्तिजनक पोस्ट के कारण कई दोस्त उनसे नाराज भी हो गए। इसलिए वाट्सएप का प्रयोग करने वालों को खास तौर से सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। इस तरह कर सकते हैं बचाव नहीं दिखेगी फोटो: अगर आप अपनी पहचान को छिपाना चाहते हैं तो वाट्सएप की सेटिंग में जाकर पहले एकाउंट फिर प्राइवेसी पर क्लिक करें। प्रोफाइल फोटो पर क्लिक करें तो तीन विकल्प आएंगे- एव्रीवन, माई कांटेक्ट्स और नोबडी। माई काटेक्ट्स को क्लिक करने से सिर्फ वही लोग अपनी फोटो देख सकेंगे जिनका नंबर आपके मोबाइल में सेव है। नोबडी करने पर कोई भी आपकी फोटो देखकर पहचान नहीं कर सकेगा। नहीं पता चलेगा कब देखा: प्राइवेसी में ही लॉस्ट सीन का विकल्प भी दिया गया है। इसके जरिए यह सूचना सार्वजनिक होने से बचाई जा सकती है कि आपने वाट्सएप अंतिम समय कब देखा था। इसमें भी एव्रीवन, माई कांटेक्ट्स और नोबडी का विकल्प है। रीड रिसिप्ट्स के जरिए आप यह जानकारी भी छिपा सकते हैं कि आपने किसी का मैसेज देखा या नहीं। कर सकते हैं ब्लाक: अगर आपकी इच्छा के अनुसार कोई बार-बार आपके वाट्सएप पर मैसेज, फोटो या वीडियो भेज रहा है तो आप प्राइवेसी में जाकर उसे ब्लॉक भी कर सकते हैं। ग्रुप इनफो से करें जानकारी: अगर कोई आपको ग्रुप से जोड़ता है तो ग्रुप इनफो से यह देख लें कि उसका एडमिन कौन है। सभी सदस्यों के बारे में भी जानकारी कर लें। अगर एडमिन परिचित न हो तो ग्रुप से न ही जुड़े बेहतर है। बहुत मजबूत नहीं है प्राइवेसी पॉलिसी आईटी विशेषज्ञ शिवम दूबे कहते हैं कि फेसबुक पर बनने वाले ग्रुप तीन श्रेणी (पब्लिक, क्लोज्ड और सीक्रेट) के होते हैं। इसकी प्राइवेसी पॉलिसी मजबूत है लेकिन वाट्सएप पर फिलहाल ऐसा नहीं है। कोई भी किसी को भी बिना पूछे ग्रुप का सदस्य बना सकता है। इसमें ग्रुप का सदस्य बनाने से पहले ग्रुप के उद्देश्य के जानकारी देते हुए जुड़ने या न जुड़ने का विकल्प देना चाहिए। बकौल दुबे आपत्तिजनक मैसेज देना या बार-बार मना करने के बाद भी संदेश देना या ग्रुप से जोड़ना आईटी एक्ट की धारा 66ए के उल्लंघन की श्रेणी में आता है। ऐसी स्थिति में आईपीसी की धारा 354 के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

Sunday, September 15, 2013

सीसैट के बाद 20% कम हुए हिन्दी माध्यम के छात्र

संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा (आईएएस) में सिविल सर्विसेज एप्टीट्यूट टेस्ट (सीसैट) लागू होने के बाद सिर्फ हिन्दी ही नहीं कन्नड़, तमिल और तेलगु भाषा के परीक्षार्थियों को भी नुकसान हो रहा है। इसका प्रमाण वे आंकड़े हैं, जिसे प्रतियोगी छात्रों ने संघ लोक सेवा आयोग की ओर से हर साल राष्ट्रपति को भेजी जाने वाली रिपोर्ट के आधार पर जुटाया है। इन आंकड़ों से साफ है कि आईएएस मेन्स में अंग्रेजी माध्यम के अभ्यर्थियों का प्रतिनिधित्व पहले की तुलना में काफी बढ़ा है। प्रतियोगियों ने यह आंकड़े निबंध के कॉमन पेपर के आधार पर तैयार किए हैं। इसके मुताबिक 2010 की आईएएस मुख्य परीक्षा में शामिल 11777 परीक्षार्थियों में से 4156 यानी 35 प्रतिशत ने हिन्दी से निबंध दिया था। 2011 की प्रारंभिक परीक्षा में सीसैट लागू होने के बाद यह प्रतिशत काफी कम हो गया। 2011 आईएएस मुख्य परीक्षा में कुल 11097 परीक्षार्थी शामिल हुए थे। इनमें हिन्दी से निबंध देने वाले परीक्षार्थियों की संख्या मात्र 1682 रही। जो कुल परीक्षार्थियों का 15 प्रतिशत ही है। स्पष्ट है कि सीसैट लागू होते ही मेन्स देने वाले हिन्दी माध्यम के परीक्षार्थियों की संख्या 20 प्रतिशत कम हो गई। इसी तरह 2010 आईएएस मेन्स में कन्नड़ भाषा से निबंध देने वाले परीक्षार्थियों की संख्या 11 थी। 2011 में यह संख्या घटकर पांच रह गई। कुछ ऐसा ही हाल तेलगु और तमिल के साथ भी हुआ। 2010 के आईएएस मेन्स में 38 परीक्षार्थियों ने तमिल भाषा में निबंध दिया था। 2011 के मेन्स में इनकी संख्या घटकर 14 हो गई। वहीं 2010 में 69 परीक्षार्थियों ने तेलगु भाषा से निबंध दिया था। 2011 में इनकी संख्या मात्र 29 रही। वहीं मेन्स में अंग्रेजी माध्यम के छात्रों की संख्या में लगभग 20 फीसदी की वृद्धि हुई है। 2010 के आईएएस मेन्स में शामिल 11777 परीक्षार्थियों में से 7329 यानी 62.23 प्रतिशत अंग्रेजी माध्यम के थे। 2011 का मेन्स देने वाले 11097 परीक्षार्थियों में से अंग्रेजी माध्यम के परीक्षार्थियों की संख्या 9203 रही। यह कुल परीक्षार्थियों का 82.93 प्रतिशत है। आयोग की रिपोर्ट के आधार पर परीक्षार्थियों द्वारा तैयार इन आंकड़ों से स्पष्ट हो जाता है कि सीसैट लागू होने के बाद हिन्दी माध्यम के छात्रों को तगड़ा झटका लगा है। ‘यह स्थिति तब की है जब केवल प्री में सीसैट लागू था। 2013 से मेन्स में भी सीसैट लागू कर दिया गया है। 2013 के मेन्स के बाद हिन्दी माध्यम के परीक्षार्थियों का हस्र और खराब हो जाएगा। हम अंग्रेजी के विरोधी नहीं हैं। हमारी मांग बस इतनी है कि हिन्दी और अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के बीच असमानता को कम किया जाए।’ -संदीप, प्रतियोगी छात्र बदला है पाठ्यक्रम तो बढ़ाएं अवसर सिविल सेवा की तैयारी करने वाले प्रतियोगियों का कहना है कि प्री में सीसैट लागू कर इसकेलगभग 66 प्रतिशत तथा मेन्स में सीसैट लागू कर इसके लगभग 57 प्रतिशत पाठ्यक्रम में बदलाव किया गया है। इसके बाद भी आयोग के अफसर अपने एक पत्र में कहते हैं कि पाठ्यक्रम में कोई मेजर बदलाव नहीं हुआ है जबकि आयोग के एक विज्ञापन में कहा जाता है कि पाठ्यक्रम में महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। प्रतियोगियों की मांग है कि इस बदलाव को देखते हुए छात्रों को आईएएस परीक्षा देने के लिए तीन अतिरिक्त अवसर ( अटैम्प) दिए जाएंगे जबकि आयु सीमा में तीन साल की वृद्धि की जाए।

Sunday, June 27, 2010

खुलेगा टीले के नीचे दाा गंगा घाटी का रहस्य

इलाहाााद के झूंसी से नौ किलोमीटर दूर स्थित हेतापट्टी के टीले के नीचे कई ऐतिहासिक रहस्य छिपे हुए हैं। यह राज गंगा के मैदान के दस हजार साल पुराने इतिहास को सामने ला सकते हैं। संस्कृतियों का उद्भव कैसे हुआ, गंगा के किनारे खेती का और कैसे शुरू की गई, जैसे कई सवालों, जो आज तक आूझ पहेलीाने हुए, के उत्तर इस घाटी के नीचे दो हैं। यह राज जल्द जनता के सामने हो सकते हैं क्योंकि इलाहाााद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग ने इस स्थान पर स्थित चारों टीलों का उत्खनन करने का निर्णय लिया है। इसाारे में विभागाध्यक्ष एवं जानेमाने पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. जेएन पाल ने इविवि प्रशासन को 1.50 लाख रुपये का प्रस्ताव दिया है। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) से उत्खनन की अनुमति लेने की प्रक्रिया भी प्रारंभ कर दी गई है।
हेतापट्टी में छोटे-ाड़े चार टीले हैं। कुछ साल पहले प्रो. पाल की अगुवाई में इनमें से एक सासे छोटे टीले की खुदाई की गई थी। इस काम पर 62 हजार रुपये खर्च हुए थे। इस उत्खनन में कई अहम तथ्य सामने आए थे। प्रो. पाल कहते हैं कि नवपाषाणकाल की चीजें मिली थीं और मौर्य काल, शंगू काल, कुषाण काल तथा गुप्त काल के संकेत मिले थे। इस उत्खनन से यह भी स्पष्ट हुआ था कि प्रारंभिक मध्यकाल में भी यह स्थल आााद था।ाकौल प्रो. पाल इस स्थल का नाम हेतापट्टी इसलिए है क्योंकि यह पहले प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। पट्टी का आशय पत्तन से है। इसकी पुष्टि खुदाई में यहां से मिले समुद्री शंख से होती है। अनुमान है किांगाल की खाड़ी से यह समुद्री शंख यहां लाए जाते थे। विभागाध्यक्ष प्रो. पाल कहते हैं कि भारत का सांस्कृतिक कलेवर गंगा घाटी से प्रभावित हुआ है।
पिछली खुदाई में एक और अहम तथ्य यह सामने आया था कि इस स्थल पर प्रारंभिक खेती (चावल की खेती) के प्रमाण मिले थे। यही वजह है कि पुरातत्व विशेषज्ञ इस स्थल को मध्य गंगा घाटी सभ्यता का पालना मानते हैं। प्रो. पाल कहते हैं कि सासे छोटे टीले की खुदाई में इतने तथ्य सामने आए थे तो चारों टीलों की खुदाई से निश्चित तौर पर कई और रहस्य से पर्दा उठेगा। यह उत्खनन गंगा के मैदान के साथ ही पूरे भारतीय सांस्कृतिक इतिहास से पुर्ननिर्माण में सहायक होगा। प्रो. पाल कहते हैं कि गंगा एक्सप्रेस वे इस रास्ते से प्रस्तावित है। सड़कानने केााद उत्खनन नहीं हो सकेगा इसलिए कोशिश की जा रही है कि यह काम जल्द पूरा कर लिया जाएगा।

नौकरी की दौड़ में कुत्तेािल्ली भी!

कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) की भर्ती परीक्षा में कुत्ते औरािल्ली भी नौकरी के लिए ‘आवेदन’ किया। आपको यह सुनकर हैरत तो होगी पर यह सच है कि एसएससी की पिछली भर्ती परीक्षाओं में ऐसे आवेदन पत्र मिले हैं, जिन पर अभ्यर्थी की फोटो के स्थान पर कुत्ता,ािल्ली या फिरािजली के खंभे की फोटो लगी हुई थी। कुछ लोगों की इस शरारत ने एसएससी के अफसरों की परेशानीाढ़ा दी है क्योंकि इन फर्जी आवेदन पत्रों को रद्द करने के लिए भी उन्हें निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है, जिसमें समर्याााद होता है। यही वजह है कि आ इससेाचाव का रास्ता खोजा जा रहा है।
एसएससी ने संयुक्त स्नातक स्तरीय भर्ती परीक्षा से ऑन लाइन आवेदन की शुरूआत की थी। इसकेााद एसएएस आप्रेंटिस भर्ती परीक्षा के लिए भी ऑन लाइन आवेदन लिया गया। ऑन लाइन आवेदन के लिए अलग वोसाइटानाई गई है। ऑन लाइन आवेदन से अभ्यर्थियों को सहूलियत हुई और भर्ती परीक्षा की प्रक्रिया में तेजी तो आई पर तकनीकी खामी से मुश्किलें भीाढ़ी हैं। अभ्यर्थियों का ऑन लाइन आवेदन पत्र तभी सामिट होता है, जा वेौंक में निर्धारित फीस जमा कर वहां से मिले ट्रांसफर चालान नांर को फार्म में फीड करते हैं। अनुसूचित जाति, जनजाति तथा महिला अभ्यर्थियों से आवेदन की फीस नहीं ली जाती है इसलिए इनका आवेदन पत्रािना ट्रांसफर चालान नांर के भी सामिट हो जाता है। इसमें अभ्यर्थियों को कुछ खर्च नहीं करना पड़ता है। कुछ शरारती लोगों ने इसी का फायदा उठाते हुए कुत्ते,ािल्ली औरािजली के खंभे की फोटो लगाकर फर्जी नाम पते से आवेदन कर दिया। ऐसे 100 से अधिक आवेदन पत्र एसएससी को मिले हैं। फार्मों की स्क्रूटनी के वक्त यह मामला पकड़ में आया।
अभ्यर्थियों को आवेदन पत्र पर अपनी फोटो कम्प्यूटर से अटैच करनी होती है। स्क्रूटनी के वक्त अफसरों को ऐसा लगा कि फोटो गलत अचैट हो गई होगी पर जा उनका ध्यान आवेदक के नाम एवं अन्य सूचनाओं पर गया तो पता चला कि आवेदन ही सही नहीं हैं क्योंकि कई फार्म में नाम के स्थान पर अंग्रेजी वर्णमाला के कुछ अक्षर लिखे हुए थे। आ स्टोनोग्राफर ग्रेड ‘सी’ और ‘डी’ की भर्ती के लिए आवेदन लिए जा रहे हैं। इसका ऑन लाइन आवेदन तीस जून से प्रारंभ होगा तो अफसरों का अनुमान है कि इसमें भी इस तरह के फर्जी आवेदन हो सकते हैं।ोली रोड स्थित एसएससी मध्य क्षेत्र के क्षेत्रीय निदेशक एके मिश्र कहते हैं कि किसी भी आवेदन पत्र को रद्द करने की एक निर्धारित प्रक्रिया है। अभ्यर्थियों को फार्म रद्द करने की वजह भीातानी पड़ती है। ऐसे फर्जी फार्मों की स्क्रूटनी में वक्र्ताााद होता है।
आनंद मिश्र, इलाहाााद

Sunday, July 26, 2009

मनोरंजन: बदलेगा कर निर्धारण का फार्मूला

-सकल कर निर्धारण प्रणाली में टिकट के दाम पर लगेगा कर
- इस बारे में अध्यादेश जारी, अधिसूचना का हो रहा इंतजार
सरकार मनोरंजन कर निर्धारण का नया फार्मूला लागू करने जा रही है। इस बारे में अध्यादेश जारी कर दिया गया है। अफसरों को अधिसूचना का इंतजार है। अधिसूचना जारी होते ही कर निर्धारण का तरीका बदल जाएगा। नया तरीका सिनेमा हॉल मालिकों को रास नहीं आ रहा है। उनका कहना है कि मंद पड़े इस धंधे में इससे और मंदी आएगी क्योंकि मजबूरी में टिकट का दाम बढ़ाना पड़ेगा।
दाम कम होने पर सिनेमा हॉल में दर्शकों की संख्या लगातार घट रही है तो बढ़ोत्तरी के बाद क्या होगा, यह चिंता हर हॉल मालिक के चेहरे पर महसूस की जा रही है। सिनेमा प्रदर्शक संघ ने इसका विरोध शुरू कर दिया है।
दर्शकों से एक टिकट के एवज में जो रकम ली जाती है, उसे पाँच भागों में विभाजित किया जाता है। अगर 50 रुपये का टिकट है तो तीन रुपये अनुरक्षण (मेंटीनेंस) के लिए निकाल दिए जाते हैं जबकि 50 पैसे फिल्म विकास निधि, 60 पैसे एसी सरचार्ज होता है। अगर सिनेमा हॉल एयरकूल्ड है तो एयरकूल्ड चार्ज के तौर पर 25 पैसे और निकाले जाते हैं। इसके बाद जो 45.6५ रुपये बचते हैं, वह प्रवेश शुल्क होता है। वर्तमान में इसी प्रवेश शुल्क पर ही साठ फीसदी मनोरंजन कर लिया जा रहा है। कर निर्धारित करने का फार्मूला भी तय है। प्रवेश शुल्क की राशि में साठ का गुणा कर 160 से भाग दिया जाता है। इस प्रकार 50 रुपये के टिकट पर 17.१1 रुपये टैक्स देना होता है।
अब सरकार सकल कर निर्धारण प्रणाली लागू करने जा रही है। इसमें सिनेमा हॉल मालिक दर्शकों से टिकट का जितना दाम लेगा, उस पूरी रकम पर टैक्स लिया जाएगा। इसके बाद 50 रुपये के टिकट पर (५0 गुणे 60 भागे 160) 18.६5 रुपये टैक्स देना पड़ेगा। टैक्स की राशि बढ़ जाएगी इसलिए मजबूरन टिकट के दाम में इजाफा करना पड़ेगा। हॉल मालिक दाम बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं।

'इस बारे में अध्यादेश जारी कर दिया गया है पर अभी अधिसूचना जारी नहीं हुई। अधिसूचना जारी होने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी कि यह व्यवस्था किस रूप में और कब से लागू की जानी है।Ó
-सुबोध वर्मा, सहायक मनोरंजन कर आयुक्त


'इससे सिनेमा हॉल मालिकों की दुश्वारियाँ बढेंगी। खास तौर से छोटे सिनेमा हॉलों की। संभव है कि कई सिनेमा हॉल बंद हो जाएँ। सरकार को सिनेमा व्यवसाइयों को प्रोत्साहित करना चाहिए। पंजाब, हरियाणा, हिमांचल प्रदेश व जम्मू कश्मीर में पिछले दो वर्षों में इस आधार पर मनोरंजन कर खत्म कर दिया गया कि सिनेमाहॉल गरीब जनता के मनोरंजन के एकमात्र साधन हैं जबकि दिल्ली और मध्य प्रदेश में मनोरंजन कर की दर 20 प्रतिशत है। यूपी में भी मनोरंजन कर 20 फीसदी किया जाना चाहिए।Ó
-मोहन सिंह, प्रबंधक, अवतार सिनेमा हॉल

Tuesday, May 12, 2009

मैं बन गया ब्लागिंग की दुनिया का सदस्य


हर रोज की तरह मैं कलक्ट्रेट में था। रिपोर्टर हूँ रोज जाना पड़ता है। इधर-उधर भटकने के बाद मैं और मेरे कुछ साथी कलक्ट्रेट कोषागार के लंच रूम में चले जाते हैं। चना युक्त लाई, गुड़, खीरा और अंत में चाय जरूर मिलती है। कभी-कभी छेने वाला दही बड़ा भी...इन सब चीजों से ज्यादा प्रिय होता है यहाँ के मुख्य कोषाधिकारी वीरेंद्र चौबे का स्नेह, प्यार और उनकी चुटीली बातें। कभी अपने गाँव का किस्सा तो अकसर पिछली तैनाती के दौरान के यादगार वाकये को सुनाकर वह गुदगुदाते रहते हैं। चाय के दौरान कोषाधिकारी सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने मुझे और मेरे साथियों को एक-एक पन्ना कागज थमाया। यह कागज नहीं बल्कि सिद्धार्थ जी के ब्लाग से प्रिंट लिया हुआ वह न्यौता था, जो उन्होंने आठ मई को प्रयाग संगीत समिति के सभागार में होने वाले हिंदी ब्लागरों के कार्यक्रम के लिए अपने मित्रों को भेजा था। सच मानिए इस वक्त तक मुझे ब्लागिंग के बारे में कुछ भी पता नहीं था। अमिताभ और शाहरुख के ब्लाग के किस्से जरुर सुना था पर ब्लाग क्या होता है, कैसे होता है, मैं नहीं जानता था। थोड़ी देर सिद्धार्थ जी के साथ बैठा तो उन्होंने मेरी अज्ञानता चंद मिनटों में दूर कर दी। बोले आपकी जी मेल आईडी है... मैं बोला- हैं। इसे आपने खुद बनाई थी...सिद्धार्थ जी ने पूछा। मैंंने हाँ में सिर हिला दिया तो बोले-मेरा ब्लाग खोलिएगा कोने में लिखा होगा क्रिएट ब्लाग वहाँ पर क्लीक कीजिएगा फिर आप समझ जाएँगे। ब्लागिंग के बारे में मैं वहाँ पर इतना कुछ सुन चुका था की मुझसे रहा नहीं गया। 3.३0 बज रहे थे। मेरे पास काफी वक्त था। तुरंत दफ्तर आया और नेट खोल कर बैठ गया। सिद्धार्थ जी ने जैसे बताया था, वैसा ही किया। नेट पर दस मिनट तक माउस इधर उधर करने और कुछ टाइपिंग के बाद मेरा ब्लाग तैयार हो गया। करीब पाँच बजे मैंंने सिद्धार्थ जी को फोन मिलाया। मोबाइल स्क्रीन पर मेरा नाम उभरते ही वह शायद मेरे फोन करने का मतलब जान गए। मेरे कुछ कहने से पहले बोले, बधाई दे दूँ क्या। मैंने कहा हाँ। सिद्धार्थ जी ने शाम को ब्लाग देखा तो उनका फोन आया। ठीक नहीं दिख रहा है, इस पर अपना फोटो डालिए और आज ही एक ब्लाग पोस्ट कीजिए ताकि कल के कार्यक्रम, जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया था, में आपका ब्लाग ओपेन कर लोगों को दिखाया जा सके। रात में मैंने फिर ब्लाग खोला और कुछ फीनिसिंग कर उसे ठीक किया।
चाँपाबोर ही क्यों...

ब्लाग का नाम पहले ही तय हो गया था। इसकी भी एक कहानी है। मेरे भाई संजय मिश्र इन दिनों प्रशासन की रिपोर्टिंग कर रहे हैं। जान-पहचान पहले से थी पर चुनाव के वक्त रिश्ता थोड़ा और मजबूत हुआ क्योंकि मुल्ला जी की दौड़ मसजिद तक वाली तर्ज पर सुबह की मीटिंग से फारिग होने के बाद वह भी कलक्ट्रेट पहुँचते हैं और मैं भी। बहरहाल..

भाई संजय हँसमुख और बेहद मजाकिया स्वभाव के हैं। लोकसभा चुनाव के लिए नामाँकन चल रहा था तो खबरें खूब मिलती थीं। डी.एम. ने अपना दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सोने लाल पटेल को निर्दल उम्मीदवार घोषित कर दिया। फैसला सबको चौंकाने वाला था। फैसले के वक्त हम लोग न्यायालय में मौजूद थे। वहाँ से डीएम के आदेश की कॉपी लेकर हम लोग दफ्तर के लिए निकल रहे थे तभी संंजय ने कहा भाई साहब आज को बहुत चाँपाबोर खबर है। चाँपाबोर का मतलब मुझे समझ में नहीं आया पर इतना जान गया कि बड़ी खबर है इसलिए संजय एेसा कह रहे होंगे। जब ब्लाग के लिए टाइटिल की बात आई तो संजय का यह शब्द मेरे दीमाग में गूँज उठा। मैंने संजय से पूछा भाई चाँपाबोर का मतलब क्या होता है। संजय हंँसने लगे, बोले अरे अइसन बोल दीहा है...वइसे ई शब्द का मतलब टनाटन से मिलत है।

मैं समझ गया। दरअसल चाँपाबोर टनाटन, टंच, टॉप क्लास जैसे हिंदी अंग्रेजी के शब्दों का अतिरेक है। मैने तय कर लिया कि कुछ अलग करने के लिए मैं अपने ब्लाग का टाइटिल यही रखूँगा।
(आनंद)