Tuesday, May 12, 2009

मैं बन गया ब्लागिंग की दुनिया का सदस्य


हर रोज की तरह मैं कलक्ट्रेट में था। रिपोर्टर हूँ रोज जाना पड़ता है। इधर-उधर भटकने के बाद मैं और मेरे कुछ साथी कलक्ट्रेट कोषागार के लंच रूम में चले जाते हैं। चना युक्त लाई, गुड़, खीरा और अंत में चाय जरूर मिलती है। कभी-कभी छेने वाला दही बड़ा भी...इन सब चीजों से ज्यादा प्रिय होता है यहाँ के मुख्य कोषाधिकारी वीरेंद्र चौबे का स्नेह, प्यार और उनकी चुटीली बातें। कभी अपने गाँव का किस्सा तो अकसर पिछली तैनाती के दौरान के यादगार वाकये को सुनाकर वह गुदगुदाते रहते हैं। चाय के दौरान कोषाधिकारी सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने मुझे और मेरे साथियों को एक-एक पन्ना कागज थमाया। यह कागज नहीं बल्कि सिद्धार्थ जी के ब्लाग से प्रिंट लिया हुआ वह न्यौता था, जो उन्होंने आठ मई को प्रयाग संगीत समिति के सभागार में होने वाले हिंदी ब्लागरों के कार्यक्रम के लिए अपने मित्रों को भेजा था। सच मानिए इस वक्त तक मुझे ब्लागिंग के बारे में कुछ भी पता नहीं था। अमिताभ और शाहरुख के ब्लाग के किस्से जरुर सुना था पर ब्लाग क्या होता है, कैसे होता है, मैं नहीं जानता था। थोड़ी देर सिद्धार्थ जी के साथ बैठा तो उन्होंने मेरी अज्ञानता चंद मिनटों में दूर कर दी। बोले आपकी जी मेल आईडी है... मैं बोला- हैं। इसे आपने खुद बनाई थी...सिद्धार्थ जी ने पूछा। मैंंने हाँ में सिर हिला दिया तो बोले-मेरा ब्लाग खोलिएगा कोने में लिखा होगा क्रिएट ब्लाग वहाँ पर क्लीक कीजिएगा फिर आप समझ जाएँगे। ब्लागिंग के बारे में मैं वहाँ पर इतना कुछ सुन चुका था की मुझसे रहा नहीं गया। 3.३0 बज रहे थे। मेरे पास काफी वक्त था। तुरंत दफ्तर आया और नेट खोल कर बैठ गया। सिद्धार्थ जी ने जैसे बताया था, वैसा ही किया। नेट पर दस मिनट तक माउस इधर उधर करने और कुछ टाइपिंग के बाद मेरा ब्लाग तैयार हो गया। करीब पाँच बजे मैंंने सिद्धार्थ जी को फोन मिलाया। मोबाइल स्क्रीन पर मेरा नाम उभरते ही वह शायद मेरे फोन करने का मतलब जान गए। मेरे कुछ कहने से पहले बोले, बधाई दे दूँ क्या। मैंने कहा हाँ। सिद्धार्थ जी ने शाम को ब्लाग देखा तो उनका फोन आया। ठीक नहीं दिख रहा है, इस पर अपना फोटो डालिए और आज ही एक ब्लाग पोस्ट कीजिए ताकि कल के कार्यक्रम, जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया था, में आपका ब्लाग ओपेन कर लोगों को दिखाया जा सके। रात में मैंने फिर ब्लाग खोला और कुछ फीनिसिंग कर उसे ठीक किया।
चाँपाबोर ही क्यों...

ब्लाग का नाम पहले ही तय हो गया था। इसकी भी एक कहानी है। मेरे भाई संजय मिश्र इन दिनों प्रशासन की रिपोर्टिंग कर रहे हैं। जान-पहचान पहले से थी पर चुनाव के वक्त रिश्ता थोड़ा और मजबूत हुआ क्योंकि मुल्ला जी की दौड़ मसजिद तक वाली तर्ज पर सुबह की मीटिंग से फारिग होने के बाद वह भी कलक्ट्रेट पहुँचते हैं और मैं भी। बहरहाल..

भाई संजय हँसमुख और बेहद मजाकिया स्वभाव के हैं। लोकसभा चुनाव के लिए नामाँकन चल रहा था तो खबरें खूब मिलती थीं। डी.एम. ने अपना दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सोने लाल पटेल को निर्दल उम्मीदवार घोषित कर दिया। फैसला सबको चौंकाने वाला था। फैसले के वक्त हम लोग न्यायालय में मौजूद थे। वहाँ से डीएम के आदेश की कॉपी लेकर हम लोग दफ्तर के लिए निकल रहे थे तभी संंजय ने कहा भाई साहब आज को बहुत चाँपाबोर खबर है। चाँपाबोर का मतलब मुझे समझ में नहीं आया पर इतना जान गया कि बड़ी खबर है इसलिए संजय एेसा कह रहे होंगे। जब ब्लाग के लिए टाइटिल की बात आई तो संजय का यह शब्द मेरे दीमाग में गूँज उठा। मैंने संजय से पूछा भाई चाँपाबोर का मतलब क्या होता है। संजय हंँसने लगे, बोले अरे अइसन बोल दीहा है...वइसे ई शब्द का मतलब टनाटन से मिलत है।

मैं समझ गया। दरअसल चाँपाबोर टनाटन, टंच, टॉप क्लास जैसे हिंदी अंग्रेजी के शब्दों का अतिरेक है। मैने तय कर लिया कि कुछ अलग करने के लिए मैं अपने ब्लाग का टाइटिल यही रखूँगा।
(आनंद)